सऊदी अरब: हिन्दू युवक को होनी थी फांसी, शेख ने 23.6 करोड़ का जुर्माना जमा कर कराया आजाद

भारत के निजामाबाद के एक हिन्दू युवक को जिसे सऊदी अरब में क़त्ल के जुर्म में मौत की सज़ा सुनाई गई थी, उसे स्थानीय शेख ने 1.3 मिलियन सउदी रियाल यानि 23.6 करोड़ रु की ब्लड मनी जुर्माने के रूप में जमा कर उसे आजाद कराया हैं। दरअसल, सऊदी अरब में सजा से बचने के लिए ब्लड मनी का प्रावधान है।

निजामाबाद से सांसद कश्मीर कविता ने इस मुद्दे को विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के समक्ष उठाया था जिसके बाद उन्होंने सऊदी अरब के स्थानीय बिसनेसमैन अवाद बिन गुरया अलसमी से बात की। अलसमी ने पिछले आठ सालो से जेल में फंसी का इंतजार कर रहे लिम्बादरी को बचाने के लिए 1.3 मिलियन सउदी रियाल यानि 1.80 करोड़ रु भुगतान किया।

तेलंगाना की राज्य महासचिव नवीन अचारी ने निजामाबाद में लिम्बादरी के परिवार से घर जाकर मुलाक़ात की और उन्हें बताया कि लिम्बादरी 15-20 दिनों में वापस घर आ जाएगा।

लिम्बादरी को 9 साल पहले गिरफ्तार किया गया था। जब देश भर में हिंसा फैली हुई थी। इस दौरान सऊदी सुरक्षा बालो द्वारा हिरासत में लिए गया था जिसके बाद सऊदी अदालत ने दोषी पाए जाने पर उसको फांसी की सजा सुनाई थी।

आइये समझते हैं कि, इस्लाम में क्या है दियत?

किसास और दिया का शाब्दिक अर्थ का मतलब होता है ‘बदला लेना’ अगर कोई शख्स किसी की हत्या कर दे तो इस्लाम के कानून के अनुसार, उसको मृत्यु-दंड दे सकता है, ताकि फिर किसी निर्दोष का खून न बहे।  इस्लाम आने से पहले इस बारें में कोई विशेष नियम नहीं था, इसलिए कभी कभी शक्तिशाली समुदाय के लोग कम्जूर समुदायों पर जैसे चाहते थे अत्याचार कर देते थे। यहाँ तक की वे सिर्फ हत्यारे का ही खून नहीं करते थे, बल्कि पुरे समुदाय को ही मार डालते थे।

लेकिन इस्लाम आने के बाद अल्लाह ने नियम बना दिया और इसके बारें में कुरान शरीफ की आयत नाजिल फरमाई, जिसमें अल्लाह ने फ़रमाया कि, ‘ऐ मोमिनों जो लोग (नाहक़) मार डाले जाएँ उनके बदले में तुम को जान के बदले जान लेने का हुक्म दिया जाता है आज़ाद के बदले आज़ाद और ग़ुलाम के बदले ग़ुलाम और औरत के बदले औरत पस जिस (क़ातिल) को उसके ईमानी भाई तालिबे केसास की तरफ से कुछ माफ़ कर दिया जाये तो उसे भी उसके क़दम ब क़दम नेकी करना और ख़ुश मआमलती से (ख़ून बहा) अदा कर देना चाहिए ये तुम्हारे परवरदिगार की तरफ आसानी और मेहरबानी है फिर उसके बाद जो ज्यादती करे तो उस के लिए दर्दनाक अज़ाब है और ऐ अक़लमनदों क़सास (के क़वाएद मुक़र्रर कर देने) में तुम्हारी ज़िन्दगी है (और इसीलिए जारी किया गया है ताकि तुम ख़ूंरेज़ी से) परहेज़ करो’ सुरह बकरह: आयत नंबर 178-179)

इस बारें में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने भी फ़रमाया कि, ‘जिस किसी का क़त्ल किया गया तो उसके वरिश अगर चाहे तो कातिल को क़त्ल कर दे या, उसके बदले दियत ले लें या फिर माफ़ कर दे’ (सही बुखारी: हदीश नंबर: 4290) जब दियत ले ली या माफ़ कर दिया तो फिर क़त्ल करने से रुक जाओ और अगर ऐसा नहीं करोगे तो यह तुम्हारी तरफ से अत्याचार समझा जायेगा।